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मौलवी मोहम्मद बाक़िर ने 1857 के विद्रोह के समर्थन में लिखा और इसकी कीमत जान देकर चुकाई। 16 सितंबर 1857 को ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया। सवाल है-जब सत्ता सच लिखने की कीमत जान से वसूल करे, तो क्या पत्रकार का तटस्थ रहना संभव है? और क्या आज की पत्रकारिता उस साहस को याद रखती है? Video-@neeraj_jhaa & @DrPankajSpeaks देखिए पूरी वीडियो Molitics के यूट्यूब चैनल पर लिंक - #IndianJournalism #JournalismHistory #1857Revolt #FirstJournalist #FreedomStruggle

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