1927 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने महाड़ में मनुस्मृति दहन को जातिगत भेदभाव के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध बनाया था। उनका संघर्ष केवल एक किताब के खिलाफ नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और छुआछूत के खिलाफ था।आज फिर मनुस्मृति जलाने की घटनाएं इसी बहस को सामने लाती हैं-क्या प्रतीकात्मक विरोध से समाज बदलता है, या असली बदलाव समानता, शिक्षा, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सोच में परिवर्तन से आता है? Video -@neeraj_jhaa देखिए पूरी वीडियो Molitics के यूट्यूब चैनल पर लिंक - #SocialJustice #CasteEquality #DalitRights #Constitution #Equality
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