सुप्रीम कोर्ट; वकील महोदय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्होंने 1967 से लेकर आज तक गहरी रिसर्च की है, लेकिन उन्हें दिल्ली पुलिस का ऐसा कोई भी स्टैंडिंग ऑर्डर या नियम नहीं मिला जिसमें पैलेट गन के इस्तेमाल या पैलेट गन हथियार का ज़िक्र हो। एक भी नहीं। उन्होंने कहा कि पैलेट गन का इस्तेमाल सबसे पहले कश्मीर में हुआ था। बाद में 2016 में, केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता वाली एक टास्क फ़ोर्स की 2011 की SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) और 2016 की एक हाई-पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट आई। लेकिन दिल्ली पुलिस का वह स्टैंडिंग ऑर्डर कहाँ है जो प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ इनके इस्तेमाल की इजाज़त देता हो? अगर ऐसा कोई ऑर्डर है, तो उसे कोर्ट के सामने पेश किया जाए। अगर नहीं है, तो किस कानूनी आधार पर छात्रों पर पैलेट गन चलाई गईं? यही वह सवाल है जो हर नागरिक को पूछना चाहिए। कुछ पल के लिए राजनीति को भूल जाइए। ज़रा सोचिए कि उस प्रदर्शन में आपका अपना बेटा या बेटी खड़ी है। जो हथियार आँखों की रोशनी या शरीर के किसी अंग को हमेशा के लिए नुकसान पहुँचा सकता है, वह अपनी बात कहने की माँग कर रहे छात्रों के ख़िलाफ़ कभी भी पहला जवाब नहीं होना चाहिए। कोई यह नहीं कह रहा कि पुलिस बेबस खड़ी रहे। पुलिस को अपनी सुरक्षा का पूरा अधिकार है। लेकिन छात्रों की ज़्यादातर शांतिपूर्ण भीड़ को काबू करने और ऐसे हथियार का इस्तेमाल करने के बीच ज़मीन-आसमान का फ़र्क है, जिसके नतीजे ज़िंदगी भर रह सकते हैं। माननीय जजों ने अब कहा है कि वे एक सही प्रोटोकॉल तय करना चाहते हैं। कि क्या पैलेट गन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए या नहीं, और अगर हाँ, तो किन हालात में। हर घायल छात्र जवाब पाने का हकदार है।
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