आज के दौर में युवा पीढ़ी की पॉलिटिकल और सोशल एंगेजमेंट का तरीका तेज़ी से बदल रहा है। हाल ही में स्टूडेंट प्रोटेस्ट के दौरान जो डिबेट उठी, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है, क्या पब्लिक डिस्कोर्स में भाषा को लेकर दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं? जब युवाओं ने शिक्षा और गवर्नेंस पर सवाल उठाए, तो बहस मुद्दों से हटकर उनके पोस्टरों और भाषा पर क्यों आ गई? क्या डर जवाबदेही का है? वीडियो - @Nivedita_Shan लिंक -
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