जब पत्रकारिता जनहित की आवाज़ न बनकर सिर्फ एक 'तमाशा' बन जाए, तो त्रासदी भी टीआरपी का जरिया बन जाती है। नेपाल के संकट और आपदाओं की अति-नाटकीय कवरेज पर आधारित यह एपिसोड हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर संवेदनाएं कैसे टीआरपी की भेंट चढ़ जाती हैं। जब मानवीय दर्द मनोरंजन बन जाए, तो इसकी असल कीमत कौन चुकाता है? विडियो - @Nivedita_Shan लिंक - #Journalism #MediaCritique #IndianMedia #TRPHarvesting #HumanityFirst #NepalFlood
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